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जूनियर वकील गुलाम नहीं: चीफ जस्टिस बोले- उन्हें ढंग की सैलरी दें;

जूनियर वकील गुलाम नहीं, उन्हें उचित वेतन दें, कानूनी पेशा “पुराने लड़कों का क्लब” नहीं होना चाहिए : सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़

नमस्कार,
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ रविवार को बार काउंसिल ऑफ इंडिया के एक कार्यक्रम में शामिल हुए। उन्होंने कहा कि बहुत लंबे समय से हम लोग कानूनी पेशे में युवाओं को गुलाम के तौर पर मानते चले आ रहे हैं। CJI ने पूछा कि कितने सीनियर हैं जो अपने जूनियर्स को ढंग की सैलरी देते हैं। आपको जूनियर वकीलों को अच्छी सैलरी देनी चाहिए और उन्हें गुलाम नहीं मानना चाहिए।

CJI ने आगे कहा कि कानूनी पेशा एक ‘ओल्ड बॉयज क्लब’ है। यहां एक नेटवर्क के जरिए सीनियर एडवोकेट के चैंबर में मौके मिलते हैं। क्या जूनियर्स को अच्छी सैलरी दी जाती है? बहुत सारे जूनियर वकील ऐसे हैं, जिनके पास खुद का चैंबर और कुर्सी तक नहीं है। यह सब बदलना चाहिए और सीनियर होने के नाते ये हमारी जिम्मेदारी है।

सीजेआई ने कहा, “इस विचार ने मुझे कभी नहीं छोड़ा, क्योंकि इतने तरीकों से यह हमारे पेशे के बारे में सच्चाई को दर्शाता है।” कानूनी पेशे में भारी असमानता को उजागर करते हुए, मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “जबकि आपके पास सुप्रीम कोर्ट में शीर्ष पायदान के वकील हैं, जिनके पास सात या आठ वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग स्क्रीन खुली होंगी, ताकि वे माउस के एक क्लिक में एक झटके के साथ एक अदालत से दूसरी अदालत में जा सकें।” फिर ऐसे वकील हैं, जो महामारी के दौरान संकट से जूझ रहे थे, जब अदालतें बंद थीं और रजिस्ट्रार की अदालत काम नहीं कर रही थी। अदालतों के फिर से खुलने के बाद, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष द्वारा किए गए अनुरोधों में से एक सबसे पहले रजिस्ट्रार की अदालत का संचालन करना था। उन्होंने कहा कि बहुत छोटे प्रक्रियात्मक मुद्दे, जैसे कानूनी उत्तराधिकारियों का प्रतिस्थापन, नियुक्ति चैंबर कोर्ट के समक्ष एक मामला”, यानी “सभी छोटी चीजें जिसके लिए जूनियर्स उस कोर्ट में दौड़ते हैं”।

उन्होंने कहा, ” अगर हम कानूनी पेशे का चेहरा बदलना चाहते हैं, तो हमें न केवल महिलाओं, बल्कि हाशिए पर पड़े समुदायों को भी समान अवसर और पहुंच प्रदान करनी होगी, ताकि हम कल बेंच पर अधिक विविधता पा सकें।” हाल ही में, LiveLaw के साथ एक विशेष साक्षात्कार में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, उदय उमेश ललित ने स्वीकार किया कि यह युवा वकीलों के बीच एक आम शिकायत है कि वे “अधिक काम करते थे, लेकिन उन्हें बहुत कम भुगतान किया जाता है। सेवानिवृत्त न्यायाधीश ने पेशे के युवा सदस्यों को “धैर्य, आत्मविश्वास और खुद पर विश्वास” रखने के लिए प्रेरित किया। जूनियर एडवोकेट को यथोचित पारिश्रमिक देने के लिए सीनियर को प्रोत्साहन देने का मुद्दा भी संविधान पीठ के समक्ष आया, जो सितंबर में अखिल भारतीय बार परीक्षा की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक बैच की सुनवाई कर रहा था।