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क्या पति या पत्नी को वापस साथ रहने के लिए अदालत कह सकती है?

01 Sep 2026 | 8 Views

क्या पति या पत्नी को वापस साथ रहने के लिए अदालत कह सकती है?

 

क्या पति या पत्नी को वापस साथ रहने के लिए अदालत कह सकती है?

धारा 9, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 – दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना (Restitution of Conjugal Rights)

रमेश और सीमा की शादी को सात वर्ष हो चुके थे। दोनों के बीच शुरू में सब कुछ सामान्य था, लेकिन समय के साथ छोटे-छोटे विवाद बड़े झगड़ों में बदलने लगे। एक दिन विवाद इतना बढ़ गया कि सीमा अपने मायके चली गई। कई महीनों तक दोनों अलग-अलग रहे।

रमेश ने कई बार सीमा को वापस घर आने के लिए कहा, परिवार के बुजुर्गों ने भी समझाने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। अंततः रमेश ने एक वकील से सलाह ली। वकील ने बताया कि यदि पति या पत्नी बिना किसी उचित कारण के दूसरे जीवनसाथी का साथ छोड़ देता है, तो पीड़ित पक्ष हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के अंतर्गत "दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना" (Restitution of Conjugal Rights) का मुकदमा दायर कर सकता है।

अदालत में रमेश ने कहा कि वह विवाह को बचाना चाहता है और अपनी पत्नी के साथ रहना चाहता है। दूसरी ओर, सीमा ने कहा कि उसके पास अलग रहने के उचित कारण हैं। अदालत ने दोनों पक्षों की बात सुनी, सबूतों पर विचार किया और यह जांचा कि क्या वास्तव में सीमा बिना उचित कारण के पति से अलग रह रही है।

यदि अदालत को यह प्रतीत हो कि एक जीवनसाथी बिना उचित कारण के दूसरे का साथ छोड़कर अलग रह रहा है, तो अदालत धारा 9 के तहत एक डिक्री (आदेश) पारित कर सकती है, जिसमें पति-पत्नी को वैवाहिक जीवन पुनः स्थापित करने का अवसर दिया जाता है।

बहुत से लोगों के मन में यह प्रश्न आता है कि क्या ऐसी डिक्री का अर्थ यह है कि अदालत पति-पत्नी को जबरन एक साथ रहने या शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर कर सकती है?

इस प्रश्न का उत्तर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण निर्णय सरोज रानी बनाम सुदर्शन कुमार चड्ढा में दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 9 का उद्देश्य विवाह को बचाना और पति-पत्नी को अपने मतभेद दूर करने का अवसर देना है। यह प्रावधान वैवाहिक संबंधों को पुनर्जीवित करने का प्रयास है, न कि किसी व्यक्ति की शारीरिक स्वतंत्रता पर बलपूर्वक हस्तक्षेप।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि "दाम्पत्य अधिकार" केवल शारीरिक संबंध तक सीमित नहीं हैं। इसमें साथ रहना, भावनात्मक सहयोग, पारिवारिक जीवन, पारस्परिक सम्मान और वैवाहिक जिम्मेदारियों का निर्वहन भी शामिल है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी डिक्री का पालन न होने पर कानून किसी व्यक्ति को बलपूर्वक साथ रहने के लिए बाध्य नहीं करता। कानून में इसका उपाय संपत्ति की कुर्की जैसी सीमित प्रक्रिया है, न कि किसी व्यक्ति को जबरन घर भेजना।

धारा 9 के लिए आवश्यक शर्तें

  1. पति या पत्नी में से कोई एक दूसरे का साथ छोड़ चुका हो।

  2. साथ छोड़ने के पीछे कोई उचित या वैध कारण न हो।

  3. मुकदमा करने वाला पक्ष स्वयं वैवाहिक दायित्व निभाने के लिए तैयार हो।

  4. अदालत को यह संतोष हो कि दाम्पत्य संबंध पुनः स्थापित किए जा सकते हैं।

कब धारा 9 का लाभ नहीं मिलेगा?

यदि अलग रहने वाला जीवनसाथी यह सिद्ध कर दे कि:

  • उसके साथ क्रूरता (Cruelty) हुई है;

  • उसे घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ा है;

  • उसे जान-माल का खतरा है;

  • पति या पत्नी ने वैवाहिक दायित्वों का गंभीर उल्लंघन किया है;

  • या कोई अन्य उचित कारण मौजूद है;

तो अदालत दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना का आदेश देने से इंकार कर सकती है।

आम जनता के लिए संदेश

धारा 9 का उद्देश्य पति या पत्नी को "सजा" देना नहीं है, बल्कि टूटते हुए वैवाहिक संबंध को बचाने का एक कानूनी अवसर प्रदान करना है। यह कानून विवाह संस्था को बनाए रखने और पति-पत्नी को संवाद तथा समझौते का एक अंतिम अवसर देने के लिए बनाया गया है। हालांकि, यह प्रावधान किसी भी व्यक्ति की गरिमा, सुरक्षा और वैध अधिकारों से ऊपर नहीं है। यदि अलग रहने के पीछे उचित कारण है, तो अदालत ऐसे व्यक्ति को जबरन वैवाहिक जीवन में लौटने के लिए बाध्य नहीं करेगी।

इसलिए, यदि पति या पत्नी बिना किसी उचित कारण के अलग रह रहे हैं, तो धारा 9 एक कानूनी उपाय उपलब्ध कराती है; लेकिन यदि अलग रहने का कारण वास्तविक, उचित और कानून द्वारा मान्य है, तो अदालत उस कारण का सम्मान करती है।

Published on: 01 Sep 2026

Global Admin
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