व्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम पुलिस शक्ति: अवैध गिरफ्तारी, हिरासत में यातना और मृत्यु पर भारतीय कानून
लेखिका: एडवोकेट सोनू अरोड़ा
"किसी भी लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति इस बात में नहीं है कि वह अपराधियों के प्रति कितना कठोर है, बल्कि इस बात में है कि वह संविधान और कानून का पालन करते हुए न्याय सुनिश्चित करता है।"
भारत का संविधान प्रत्येक व्यक्ति को जीवन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा के साथ जीने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। किसी व्यक्ति पर कितना भी गंभीर आरोप क्यों न हो, उसे दोषी ठहराने और दंडित करने का अधिकार केवल सक्षम न्यायालय को है। पुलिस का संवैधानिक और वैधानिक दायित्व अपराध की निष्पक्ष जांच करना, विधि के अनुसार आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखना है। पुलिस स्वयं न्यायालय नहीं है और न ही उसे किसी व्यक्ति को दंडित करने का अधिकार प्राप्त है।
भारत में विधि के शासन (Rule of Law) का मूल सिद्धांत यह है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है—न नागरिक, न पुलिस और न ही स्वयं राज्य। राज्य की प्रत्येक शक्ति संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर ही प्रयोग की जा सकती है।
भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त सुरक्षा
अनुच्छेद 14 – कानून के समक्ष समानता
प्रत्येक व्यक्ति कानून के समक्ष समान है तथा सभी को कानून का समान संरक्षण प्राप्त है।
अनुच्छेद 20(3) – आत्मदोषारोपण के विरुद्ध संरक्षण
किसी भी आरोपी को स्वयं अपने विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से केवल विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है। यह अनुच्छेद गरिमापूर्ण जीवन, निष्पक्ष सुनवाई और विधिसम्मत प्रक्रिया का आधार है।
अनुच्छेद 22 – गिरफ्तारी के समय अधिकार
गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारण बताए जाने, अपनी पसंद के अधिवक्ता से परामर्श करने तथा गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किए जाने का अधिकार प्राप्त है।
महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत
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अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो, दंड देने का अधिकार केवल न्यायालय को है।
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पुलिस का दायित्व कानून लागू करना है, स्वयं कानून बन जाना नहीं।
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अवैध गिरफ्तारी, अवैध हिरासत, हिरासत में यातना (Custodial Torture) और हिरासत में मृत्यु (Custodial Death) संविधान की भावना तथा विधि के शासन के प्रतिकूल हैं।
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प्रत्येक आरोपी, चाहे उसके विरुद्ध आरोप कितना भी गंभीर हो, मानव गरिमा और निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया का अधिकारी है।
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अपराध नियंत्रण और कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का महत्वपूर्ण कर्तव्य है, किंतु प्रत्येक कार्रवाई संविधान और कानून की सीमाओं के भीतर ही की जानी चाहिए।
एक सशक्त और परिपक्व लोकतंत्र की पहचान केवल अपराध नियंत्रण से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह सबसे कठिन परिस्थितियों में भी संविधान, विधि के शासन और मानव गरिमा की रक्षा करता है।
"न्याय का अर्थ केवल दोषी को दंड देना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि किसी निर्दोष या आरोपी व्यक्ति के साथ कानून के बाहर जाकर कोई अत्याचार न हो।"
"Rule of Law का वास्तविक अर्थ यही है कि राज्य की प्रत्येक शक्ति भी संविधान के अधीन है।"